द टर्मिनल : स्पीलबर्ग की बेहतरीन फिल्मों में से एक.

द टर्मिनल असल में कॉमेडी और इमोशन्स का एक बढ़िया बैलेंस है.

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जब दुनिया के दो ग्रेट आर्टिस्ट्स साथ मिलकर काम करते हैं तो धमाका होना लाज़मी है. हम बात कर रहे हैं ऑस्कर विनिंग डायरेक्टर स्टीवेन स्पीलबर्ग और टॉम हैंक्स की फिल्म ‘द टर्मिनल’ की. ‘द टर्मिनल’ एक ऐसी फिल्म है जो वाकइ ऑडियंस के साथ एक खास रिश्ता बनाती है. इस फिल्म में इमोशन्स है, रोमांस है, कॉमेडी है और सबसे बड़ी बात एक बढिया स्टोरी है.
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A Screenshot from the movie_The Terminal
फिल्म की स्टोरी जितनी सिंपल है उतनी ही फिल्म इंट्रेंस्टिंग भी है. विक्टर नर्वोस्की नाम का एक आदमी न्यूयार्क के जॉन एफ. कैनेडी एयरपोर्ट पर इसलिए फस जाता है क्योकि उसके देश में पॉलिटिकल अनरेस्ट की सिचुएशन है, जिस वजह से यू.एन. उसके देश क्रकोशिया को मान्यता नहीं देता और विक्टर का पासपोर्ट एयरपोर्ट ऑफिशियल्स के द्वारा जब्त कर लिया जाता है. अब न ही वो अपने देश वापस जा सकता है और न ही न्यूयार्क सिटी में इंटर करने की उसे परमिशन है. उसका अब सिर्फ एक ही घर है – टर्मीनल. विक्टर के लिए सबसे बड़ी परेशानी ये है कि उसे इंग्लिश नहीं आती, वो अपने देश से इंग्लिश के कुछ सिंपल कन्वर्शेन्स में काम आने वाले वर्ड्स ही पता है. अब विक्टर टर्मिनल के अंडर कंस्ट्रक्शन गेट न. 67 में रहने लगता है. वो टर्मिनल के अंदर ही दोस्त बनाता है, इंग्लिश लैंग्वेज सीखता है, अपने लिए काम की तलाश करता है और वहीं उसे एक फ्लाइट अटेंडेट से प्यार भी हो जाता है.
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तो कौन थे विक्टर के दोस्त? कैसे सीखता है विक्टर इंग्लिश? कौन थी वो लड़की जिससे विक्टर को प्यार होता है और सबसे बड़ी बात विक्टर न्यूयार्क गया किसलिए था?  इन सब सवालों को जानने के लिए आपको देखनी होगी ये मूवी – The Terminal.
एक खास बात आपको बता दें लेकिन किसी को बताइयेगा मत- ये फिल्म एक सच्ची घटना पर बेस्ड है. ये कहानी है ईरान के एक शरणार्थी मेहरान करिमी नासरी की, जो पेरिस के चार्ल्स डी गॉल एयरपोर्ट के टर्मिनल वन में 26 अगस्त 1988 से जुलाई 2006 के बीच रह रहे थे. किसी भी एयरपोर्ट पर सबसे ज्यादा समय तक रहने का रिकार्ड भी करिमी के नाम पर ही है.
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A Screenshot from the movie_The Terminal
मेहरान करिमी नासरी की आत्मकथा 2004 में एक बुक, ‘द टर्मिनल मैन’ के रूप में प्रकाशित की गई थी. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार स्टीवन स्पीलबर्ग ने अपनी फिल्म बनाने के लिए नासरी के बुक राइट्स को करीब 250,000 डॉलर में खरीदा था, जिसे स्पीलबर्ग ने अपने ही अंदाज में दिखाया है. फिल्म में एक साफ सुथरी कॉमेडी है जो आजकल की फिल्मों से गायब सी होती जा रही है. फिल्म में कॉमेडी सीन्स देखकर चार्ली चैपलिन की याद आ जाती है.  हालांकि इस फिल्म में कॉमेडी और इमोशन्स दोनो का ही बैलेंस देखने को मिलता है.
टॉम हैंक्स के एक्टिंग से आपको फिल्म में कहीं भी ऐसा नहीं लगेगा कि उन्होंने हँसाने की कोशिश की है फिर भी उनके एक्सप्रेशन्स आपको गुदगुदा जाते हैं. कैथरीन ज़ेटा-जोन्स की एक्टिंग भी काफी काबिले-तारीफ है. फिल्म में और भी कई बेहतरीन एक्टर्स ने काम किया है. फिल्म में एक्टिंग और इसकी स्टोरी परफेक्ट लेवल की है.
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स्पीलबर्ग ने स्टोरी को इतना आसान बनाया है कि फिल्म हर सेकंड आपको बांधे रखती है. उनके डायरेक्शन के बारे में बस इतना कह सकते है कि ये उनकी एक बेहतरीन फिल्म है जिसको काफी उम्दा तरीके से बड़े पर्दे पर दिखाया गया है. तो आप भी देखिये और एनज्वॉय कीजिए.
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Article By – Varun Kumar Gupta

कुछ और इंट्रस्टिंग खबरों के लिए पढ़े – द एक्सपेरिमेंटल ट्रूथ

http://theexperimentaltruth.com

 

 

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